भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

पाटिया पार की / शिशु पाल सिंह 'शिशु'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

है बहुत ग़मगीन व गमख्वार पटिया पार की,
आपने देखी कहाँ सरकार पटिया पार की।

बाजरे का या चने का है सादा भोजन यहाँ,
भोगती है पेट के आज़ार पाटिया पार की।

कुओं में पानी यहाँ मिलता है सत्तर हाँथ पर,
फिर भला हो किस तरह बीमार पटिया पार की।

इधर चम्बल उधर यमुना बीच में यह घिर गई,
छू रही दो नदियों की धार पटिया पार की।

धार पानीदार दोनों ओर इनके देख लो,
यों दुधारा हो गई तलवार पटिया पार की।

पुलिस पलटन में यहाँ के हैं जवान भरे पड़े,
है दिलेरी में बहुत दिलदार पटिया पार की।

रेल, तार, नहर न है कोई बड़ा इसमें शहर,
डाकखाने पा सकी दो चार पटिया पार की।

 "शिशु" बुरा कहते अगर तुम धार और पचार से,
तो न फिर तुमसे करेगी प्यार पटिया पार की।