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पाठकों के लिए एक पत्र कविता की ही शक़्ल में / नेहा नरुका

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उस समय घड़ी में एक बज रहा होता है
तभी एक पाठक मित्र का फ़ोन घनघनाता है
मैं फ़ोन उठाती हूँ
मैडम में आपका पाठक बोल रहा हूँ
आपकी कविता पढ़ी
बड़ी सुन्दर है
बगल में आपका नम्बर भी छपा था
इधर से मैं बोलती हूँ
शुक्रिया !
मैडम......!!

मैं फ़ोन काट देती हूँ
सुबह होने ही वाली थी
मैं फ़ेसबुक खोलती हूँ
मैसेज का जमवड़ा लगा था इनबॉक्स में ।
पहला मैसेज....
मैडम आपकी कविता भी बहुत सुन्दर है आप भी....
(मेरी सुन्दरता कितनी महत्वपूर्ण है इसका मुझे तुरंत तत्वज्ञान हो गया)

मैं अपने एक कवि पुरुष मित्र से पूछती हूँ
क्या इसी तरह के मैसेज और कॉल आते है तुम्हारे पास भी
वह हँस पड़ता है
मैं पूछती हूँ
क्या मैं महान् कवियत्री हूँ
वह फिर हँस पड़ता है
क्या स्त्री द्वारा रचे हुए साहित्य की ऐसे ही आलोचना होनी चाहिए

वह हँसते हुए बोलता है स्वस्थ आलोचना होनी चाहिए
पर आजकल होती कहाँ है...
मैं पूछती हूँ पाठक कविता पसन्द करते है या फ़ोटो
वह फिर हँसता है
दोनों !

मैं एकाएक चकरा जाती हूँ
शक होने लगता है मुझे अपने ही लिखे पर
शक होने लगता है मुझे अपने चेहरे पर

लगता है चेहरा नुमाइश है
कविता है कोई इश्तिहार

आलोचना फ़ैक्ट्री है
पाठक है एजेन्ट

मैं अपने फ़ोटो पर कालिख़ पोत कर
नज़र मिलाना चाहती हूँ अपनी ही कविता से

क्या मेरे पाठक मित्र भी ऐसा ही करेंगे....