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पाण्डव जन्म / गढ़वाली लोक-गाथा

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

परगट ह्वै जान, परगट ह्वै जान,
परगट ह्वै जान, पाँच भाई पंडऊं[1]
परगट ह्वै जान कोन्ती माता,
परगट ह्वै जान राणी द्रोपता।
कोन्ती माता होली पंडौं की माता,
नंगों कू बस्तर देंदी, भूकों को अन्न।
नंगों देखीक वस्त्र नी लांदी,
भूकों देखीक खाणू नी खाँदी।
कोन्ती माता होली धर्म्याली माता,
बार बरस तैं करदी रै दुर्बासा की सेवा
तब रिषि दुर्बासा परसन्न ह्वैन,
कोन्तीं माता तैं पुत्र बरदान दीने!
तेरा पाँच पुत्र होला छेतरी[2] माल[3],
काटीक नी कटोन मारीक नी करोन।
तब पाँच मंत्र रिषीन दीन्या,
रण लैगे कोन्ती तब मैत[4] घर।
एक दिन धर्म्याली तीर्थ नहेन्दी,
सूरज तैं वा पाणी चढ़ौंदी।
मंत्र जाप करे तब वीन-
प्रभु की लीला छई, कर्ण पैदा ह्वैगे!
बार वर्ष पढ़े मातान धर्म मंत्र,
धर्म मंत्र पढ़ीक ह्वै गैन धर्मराज!

बार वर्ष पढ़े मातान वायु मंत्र,
पैदा ह्वैन तब बली भीमसण!
बार वर्ष करे मातान इन्द्र को जाप,
पैदा ह्वै गैन हाँ जी, अजुन धनुर्धारी!
तब बार वर्ष पढ़े मातान पाँडु मंत्र,
त पैदा ह्वैन नकुल कुँवर!
बार वर्ष पढ़े माता ने ब्रह्म मंत्र,
पढ़ीक कनो ह्वैगे सहदेव ब्रह्म!
पाँच पुत्र पंडौ छा कुन्ती का,
धरती की शोभा छया, देवतौं माण्याँ!
धर्मराज युधिष्ठर होला धर्म का ज्ञानी,
जौन गरीब नी संतायो, बुरो नी मप्यायो!
बंध्या रैन जु धर्म की डोरी,
धर्मराज होला सत का पुजारी!
अरजुन राजा होलू बीर भारी,
कृष्ण सारथी जैका रैन!
वैका बाण बैरियों का काल,
वैको गुस्सा जिन्दड़ी[5] को ज्यान[6]!
कनो होलो स्यो वीर विभीषण[7],
सौ मण की गदा होली नौ मन की ढाल!
आगी को खेलाड़ी होलो बीर,
ऐड़ी हत्यारी[8] को पैरवारी[9]!
जंगल जंगल भाबर[10], भाबर-
होईन बीरु, तुमूक प्यारा।
बार मास रये, बणवासी जोगी,
कंद-मूल खैक, दिन बितैन।
दुरजोधन छयो, कौरव राजा,
हस्तिनापुर को राज, पंडौं नी देन्दू।
लोरा-छापर-सी, तब पंडोऊँ,
बणू-बणू रीड़दा छा, लूकी-लूकीक।
ऊँक तैं धाम नी छौ, नी छौ पाणी,
पेट की नी छै, रुड़ी[11] सी बणाँग,
भूक नी छै, तीस ऊँकू।

शब्दार्थ
  1. पांडव
  2. क्षत्रिय
  3. मल्ल, योद्धा
  4. मायका
  5. जिन्दगी
  6. प्राण, जाने वाला
  7. भीम
  8. हथियार
  9. पहनने वाला
  10. घाटी, गर्म प्रदेश
  11. गर्मी