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पितामह-सागर / बलदेव वंशी

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अपनी स्नेहिल गोद में उठा
तृप्ति की कैसी हिलोरें देते हो
पितामह !

जन्मांतरों के पार की
कहीं गहरे मुंदी पड़ी
अचेत में अंकित सुधियाँ
बेसुध कर रहीं लहरें
काल-अंतराल ही पिघल कर
लहर-लहर हो जाता है
अनंत ही अनंत को गाता है !...