भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

पिता का महत्व / मनोज चारण 'कुमार'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पिता की छाया क्या होती है,
पूछो किसी बिन बाप के बेटे से,
जब स्कूल में मास्टरजी डांटे,
गली के लङके पीटने की
दे धमकी
जब फीस भरने के वक्त माँ
असहाय दिखती है
तो पिता की कमी खलती है।
कहने को तो पिता कभी
दुलार नहीं करते,
पर इसका मतलब ये नहीं
कि वो प्यार नहीं करते।
पर पिता प्यार जता नहीं सकते,
कितना करते है बता नहीं सकते,
कुछ होती है मजबूरीयां
तभी तो पिता रखते हैं बनाये
कुछ निश्चित सी दूरीयां।
पिता हंसते नहीं बच्चों संग,
तो मतलब ये नहीं कि,
है उनका दिल तंग।
पर सच ये है दोस्तों,
छुपी सी तिरछी नजर से,
झांक लेते है वो आपकी,
नादानीयां,
बदमासियां,
आपकी हास्य भरी कारगुजारियां।
पिता
अनुशासन होते हैं घर का,
पिता राशन होते हैं घर का,
पिता प्यास का पानी है,
पिता नहींतो फिर दोस्त
क्या जिंदगानी है।