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पीपल की छाँह / मानबहादुर सिंह

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धूप का लम्बा फैलाव
एक हँसी की तरह सब-कुछ को
अपने सुख में लीले हुए --
पीपल के पेड़ के नीचे
छाया अघाई हुई सुखी उमर की तरह
लेटी है तृप्त और प्रसन्न ।
हर चीज़ के पीछे सूरज का अहसास धड़क रहा है ।

वह बुज़ुर्ग दरख्त जिसकी मोटी जड़ें
श्रद्धा के चढ़ाए गए जल से पुष्ट
हिन्दू परम्परा के लिए खड़ा है
उसकी छाँह में अभिशप्त है
आम का एक बिरवा-पीला हतप्रभ
अपने बौने क़द की विवशता में ।

इस पीपल को प्रतिदिन
मेरी मौसी नहा-धो जल चढ़ाती हैं ।
क्या है उनकी मनौती
आँचल में हाथ जोड़ इस प्राचीन जंगल से
कौन सा फल माँगती हैं ?
जबकि आम का सम्भावित दरख़्त
उसकी ओछाँह में पड़ा मुरझा रहा है ।
कितने मीठे फलों की सम्भावना लिए
एक जीवन मौसी के बूढ़े पति के साथ पियरा रहा है --

सूरज का वह अहसास जो उससे बाहर
पाँवों तले घास की फुनगियों में
चमक रहा है
उसकी रोशनी मौसी में कहीं तो नहीं पनप रही ।
वह हँसी जिसकी धूप में हर चीज़ खिलखिलाती हुई
दिन की तरह निकल रही है
मौसी में किस तरह सन्ध्या में ढल रही है
आम के उस पेड़ को देखती, अपनी उमर से बेख़बर
अपने सेन्दूर से पीपल की जड़ों को सींच रही है
उदासी में नहाई हुई ।
इस पीपल के नीचे आम के कितने अजन्मे बीज
बसन्तों से अनछुए सूख गए
तृप्त और प्रसन्न लेटी छाँह की बगल ।