भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

पुरख़तर यूँ रास्ते पहले न थे / डी. एम. मिश्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

पुरख़तर यूँ रास्ते पहले न थे
हर क़दम पर भेड़िये पहले न थे

अब के बच्चे भी तमंचे रख रहे
इतने सस्ते असलहे पहले न थे

देश में पहले भी नेता हो चुके
यूँ लुटेरे दोगले पहले न थे

दोस्तो कितना पतन होगा अभी
इस क़दर पुल टूटते पहले न थे

जल को भी दरपन बना लेते थे लोग
इतने गँदले आइने पहले न थे

माँगते थे पुत्र, पैसे बाप से
हक़ जताकर छीनते पहले न थे

जब से छूटी नौकरी यह हाल है
यूँ सनम तुम रूठते पहले न थे