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पुरवाई के संग आ रही / धीरज श्रीवास्तव

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पुरवाई के संग आ रही भीनी-भीनी गंध ।
महक उठा है तुम्हें याद कर फिर से वो संबंध ।

जाने कितने दाँव लगाये
बहुत लड़े पर हार गये !
मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारों में
जाने कितनी बार गये !

कर पाये पर नहीं वक्त से हम कोई अनुबंध ।
महक उठा है तुम्हें याद कर फिर से वो संबंध ।

चल सकते थे जितना भी हम
साथ तुम्हारे चले बहुत !
नर्म चाँदनी में भी तुमको
सोच-सोचकर जले बहुत !

मजबूरी में मगर सभी हम भूल गये सौगंध ।
महक उठा है तुम्हें याद कर फिर से वो संबंध ।

जो बिखरे यादों के मोती
उनको चुनकर लाने की !
इसीलिए ये आज तुम्हारे
जिद करता घर जाने की !

कैसे भला लगायें अब हम इस दिल पर प्रतिबंध ।
महक उठा है तुम्हें याद कर फिर से वो संबंध ।

भाग्य नहीं है कैसे खेलें
उन बालों में गजरों से ?
जल ही जल बस अभी दिख रहा
दूर तलक इन नजरों से !

टूट चले हैं प्रिये नयन के आज सभी तटबंध ।
महक उठा है तुम्हें याद कर फिर से वो संबंध ।