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पुष्प का अनुराग / कुलवंत सिंह

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विधु से मादक शीतलता ले
शोख चांदनी उज्ज्वलता ले,
भू से कण कण चेतनता ले
अंतर्मन की सुंदरता ले.
 
अरुणिम आभा अरुणोदय से
सात रंग ले किरण प्रभा से,
रंग चुरा मनभावन उससे
प्रीत दिलों में जिससे बरसे.
 
जल बूंदों से निर्मलता ले
पवन तरंगों से झूला ले,
संगीत अलौकिक नभ से ले
मधु रस अपने यौवन का ले.
 
डाल डाली पर यौवन भार
गाता मधुमय गीत बहार,
पुष्प सुवास बह संग बयार
रति मनसिज सी प्रेम पुकार.
 
पाकर मधुमय पुष्प सुवास
गंध को भर कर अपनी श्वास
इक तितली ने लिया प्रवास,
किया पुष्प पर उसने वास.
 
मधुर प्रीत की छिड़ गई रीत
दोनों लिपटे कह कर मीत,
पंखुड़ियों ने भूली नीति
मूक मधुर बिखरा संगीत.
 
अतिशय सुख वह मौन मिलन का
मद मधुमय उस रस अनुभव का,
कंपन करती पंखुड़ियों का
तितली के झंकृत पंखों का.
 
पराग कणों से कर आलिंगन
शिथिल हुए दोनों के तन मन,
सुख मिलता सब करके अर्पण
हर इक कण में रब का वर्णन.