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पृथ्वीनारायण / सुवानन्द दास

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… … … … …
… … … को कसार है :
तजई सपना भया … …
। का दरिसन विसेस्वरका पास है :
पाँच … … … वेगि दरिवार है :
कंम्मर कटारि भोरि ढालतरवार है :
ईश्वरको डोर लागि अब जाम्‌ला कासि है :
ला … निसाना भया दौडि भया असवारि है :
काटि कुटि कटहर वट … … …
… … कि चौकी तर उतरंला पार है :
मध्य पठान बोलिके कौन्या रुप कौन्या भाति
               कौन्या आयो आदमी है :
कहिये जो गंगा पुनि … … …
… … प्रतापि राजै पृथिनारायन्साहि है :
गंगामा डुबुल्‌कि लिई मणिकर्णिकामा अस्नान गरि
विसेस्वर जल ढालि कुसासन चौकि वसि
माथमा मण्डल छाई पिण्ड परधान है :
तरपर … … … कंचनको दान है
होम जग सतरुद्रि दिया गजदान है :
त्रिपटि ब्रह्मानलाई भोजन था … … …
… … … … षाड पकवान है :
बैठी राजै सिंघासन आफू षान्न प्वान है :
कालुपाँडे भान्नौ जैसि बाहुन् नानि मन्तरि बोलाव है :
घर योकि भारदारि जेठा बुढा सरदारी
पाचई परम्श्वरि सांराम उठाव है :
हंसरुप घरि भिम्‌सिन्‌को सरुप गरि
भुमराको भेस गरि सुनई लुटाव है :
क्षेत्रीको करम गरि पापाई छुटाव है :
कोटिलिंग कोटि टेकु नगर कि ढोका छेकु
पसुपति पूजा गरि तव लाम्‌ला पाति है :
पसुपति पुजा गरि तव लाम्ला पाति है :
पुरव कि बानि पानि नेपाल कि सुनाषानी
सर्व नर पुन्या दानि छुटि दानमान है :
तनहौले घट लुज्यो पालपाले मुटु भिज्यो
कसक्यालि उदेषायो पर्वते विलषायो
             छलियो पिउटानि है :
अब जाउला निलकंन्ठ सिंबुक्षेत्र पसुपति
तलाउ भैचन् वाग्मति गोकर्ण गुज्यास्वरि
             विस्नुमति व्रत है :
मध्यानकि मनोधरि सवेर अस्नान गरि
जब तिल कुस घरि कंचनकि झारि भरि
कवल पहुप सारि दुहु वाहुलि कर जोरि
             तलेजु वुझाव है :
आजिपुत्र पारी जात्रा पंजिकमा महिक सुत
आत्र चन्द गंन्ध धुप द्रिपक नैवेद चधाव है :
चौडंडिका सांघ लागि हेटुडाको जागत षाई
डिल्लीको मोहोर ल्याई नगर पाटन मिचिकन
              रजाई चलाव है :
पुर्वको काम सांधि सुगुद सुवई राधो
ज्यामिर बधुक सांधि देसको तारका बाजि
मर्दका महाराजि सुर्ज्या कृणि जैस्व
              राजै लिया रुप है :
लाहुरि नेपाल गई दुदकोसि सांध लाई
              ल्याया गजमोति है :
झिल्लीमिल्ली तरवार विज्युलि कि जोति है
गोकुल पुग्यो नुंवाकोट कृष्णअउतारि है :
घानमा लाग्यो वान पंन्द्र सहे गिडा परे
वाह्रवटि सति चले घेरे लामुडांडा है :
नुरहि तुरहि बाजे भेरि तोप कर्णालि है
झिना झां करकाई फादाफुदा लरकाई
माघमा अम्बर छाई भया असवार है :
देउघाट जाई राजै माच अंसवार है :
नेपालको सिन्‌कि लुटि मंरातको घिले भुटि
पालपाको ल्याव हिंग जिरो रिसिंगको ल्याव पिरो
तनहुँको भातसित भीर्कोटको दालसित
कन्चन कटौरा भरि स्वरणका थलिया भरि
अप्टदल चौकि बसि गंगाजल झारि भरि
पुरुव मुहुंडा गरि माहाराजको जिउसार बनाव है  :
वानु साहि दाजुभाई दरजनी मान है :
वानु साहि चित्त जोरं तनहुं तंग तोरि
आफु ती नेवार्या जाति वोल्छ ता ललितपुरि
आफु ता मजमकुटु तंरो ता वलियो मुटु
नाम रह्या गजानि धरम तपरे तरा भरले ते
वगर छुटयो तांति ककनि को लायो सांधि
नुगाम सन्ताप सह्या जिवको य्कलो भया
धनको दुबलो भञा भोककं भोर्जन नाहिं
काम करुँ दाहि नाहि बतयेको करेम नाहिं
ठंण्डसं वस्त्रा नाहि राजैभक्ति कृति जानी
                 लाउने सुवानन्ददास है :
     सुदवा असुदवा ममदा

             ‘वीरकालीन कविता’ बाट साभार