पोस्टमैन / कुमार कृष्ण

धरती पर चलते सरकारी पाँव है पोस्टमैन
वह है बाजुओं वाला अखबार
पंख वाली उम्मीद

चला जाएगा बहुत जल्दी इस धरती पर से पोस्टमैन
जैसे चली गई मोर्स की
लुप्त हो गई टेलीग्राम
चले गए सब तार बाबू

भरा रहता था उसका बस्ता-
कभी ख़ुशी की ख़ुशबू से
वहाँ रहती थी उम्मीद की खनक
कुशलता के सपनों के बेशुमार बीज
उत्सवों का उल्लास
उसके बस्ते में रहते थे तरह-तरह के बादल
पोस्टमैन था उम्मीद का पेड़
अनगिनत दरवाजों की घण्टी
कभी-कभार जब लाता था पोस्टमैन-
लाल स्याही में लिखा पोस्टकार्ड
उस दिन भीग जाती थी सरकारी वर्दी
रिश्तों की आवाज़ का दूसरा नाम था पोस्टमैन

पोस्टमैन सोचता है बार-बार
आखिर क्यों नहीं खरीदते लोग अन्तर्देशीय पत्र
लोग आंखों से नहीं
कानों से पढ़ने लगे हैं चिट्ठियाँ
खत्म हो गया है काग़ज़ का चिट्ठी बनना
खत्म हो गया है क़लम और चिट्ठी का-
सदियों पुराना रिश्ता
सूखता जा रहा है उम्मीद का पेड़

दोस्तो एक दिन-
संग्रहालय में ही मिलेंगी चिट्ठियाँ
पोस्टमैन किसी डिक्शनरी में छुपा होगा
दोस्तो! कभी फ़ेसबुक से फुर्सत मिले तो सोचना-
अन्तर्देशीय पत्र के बारे में
सोचना काग़ज़ और क़लम के रिश्ते के बारे में
सोचना पोस्टमैन के बारे में
क्या पता सूखे बादलों से गिरने लगे वर्षा कि बूंदें
उगने लगे फिर से उम्मीद का पेड़
चलने लगे साहस के पाँव इस धरती पर।

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