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प्रतिरोध / रमणिका गुप्ता

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हमने तो कलियाँ माँगी ही नहीं
काँटे ही माँगे
पर वो भी नहीं मिले
यह न मिलने का एहसास
जब सालता है
तो काँटों से भी अधिक गहरा चुभ जाता है
तब
प्रतिरोध में उठ जाता है मन—
भाले की नोकों से अधिक मारक बनकर

हमने कभी वट-वृक्ष की फुनगी पर बैठकर
इतराने की कोशिश नहीं की

हमने तो उसके जड़ों के गिर्द जमे रहकर
शान्ति से
समय की शताब्दी काट लेने की चाह
पाली थी सदा
पर
निरन्तर बौछारों ने यह भी न माना
बार-बार हमारे जमे रहने की चाह को
ठुकराती रहीं
धकेल-धकेल कर—
बहाती रहीं धार में / साल-दर-साल
ठोकरें खाने के लिए
टिकने नहीं दिया हमें
किसी भी पेड़ की जड़ के पास

यह न टिक पाने का एहसास
जब सालता है तो
बौछार से अधिक ज़ोरदार
धक्का मारता है
तब
प्रतिरोध में उठ जाते
सब मिट्टी के कण
जड़ों को उखाड़ देते हैं हम—
नंगे हो जाते हैं वन
और
चल देते हैं नये ठौर खोजने— हम
गिर जाते हैं
तब
बड़े-बड़े वट-वृक्ष भी
क्या बिगाड़ लेंगी बौछारें हमारा?
हम ठेंगा दिखाते चले जाते हैं—
हम तो आदी हैं न
बहने के
हर रोज़ ठौर बदलने के!
हमने तो नहीं कहा कभी
कि तर्क-हीन बात मान लो हमारी
जब तुम तर्क-संगत बात सुनने को भी
तैयार नहीं होते तो
यह न सुने जाने का—न पहचाने जाने का—एहसास
हमें मनुष्य माने जाने से भी इनकार—
जब सालता है— तो तर्क से अधिक धारदार बनकर
काटता है
तब—
प्रतिरोध में उठ जाता है
समूह बनकर जन

तब तुम—
तर्क-हीन शर्त मानने पर भी
तैयार हो जाते हो
हमें क्या?
हम तो—
जीवन-भर तर्क-इतर जीने के आदी हैं
तर्क-तर जीने की बात कब की थी कभी हमने?
अब तो तुम अपनी सोचो— अपनी?