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प्रथम प्रेम का मधुर विहान / केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’

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मादक है वसन्त का सौरभ
मादक फूलों की मुस्कान!
मादक है जीवन के नभ में
प्रथम-प्रेम का मधुर-विहान!

मादक है सावन की उठती हुई
उमंगों की क्रीड़ा
मादक है प्यारी के उस
अलसाये यौवन की ब्रीड़ा!

मादक सुरा-पात्र, मादक वह
सुहागिनी वनमाला है!
किंतु कौन जाने कितनी
मादक यह अंतर्ज्वाला है!

कितनी स्मृतियां बांधी थीं
मैंने संध्या की अलकों में!
अरे, चित्र खींचे थे कितने
नभ की नीलम-पलकों में!

इन उल्लास-भरी लहरों में
छोड़े थे कितने मृदु-गान!
तोड़-तोड़ फेंके थे पथ पर
कितने लोचन-पुष्प अजान!

रोता है निराश-जीवन निर्गंध
शुष्क पंखड़ियों में!
प्यारे! कौन रहस्य छिपा था
सुख की उन मृदु घड़ियों में!