प्रथम भुराई प्रेम-पाठनि पढ़ाई उन
तन-मन कीन्हें बिरहागि के तपेला हैं ।
कहै रतनाकर त्यौं आप अब तापै आइ
सांसनि की सांसति के झारत झमेला हैं ॥
ऐसे-ऐसे सुभ उपदेश के दिवैयनि की
ऊधौ ब्रजदेश मैं अपेल रेल-रेला हैं ॥
वे तौ भए जोगी जाइ पाइ कूबरी कौ जोग
आप कहैं उनके गुरु हैं किधौं चेला हैं ॥70॥