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प्रभात को परब जाग, गो सरूप पृथ्वी जाग / गढ़वाली

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

प्रभात को परब[1] जाग, गो सरूप पृथ्वी जाग
धर्म सरुपी अगास[2] जाग, उदयंकारी काँठा[3] जाग।
भानुपँखी गरड़ जाग, सत लोक जाग।
मेघ-लोक जाग, इन्द्र-लोक जाग।
सूर्य-लोक जाग, चन्द्र-लोक जाग,
तारालोक जाग, पवन-लोक जाग।
ब्रह्मा का वेद जाग, गौरी का गणेश जाग।
हरो भरो संसार जाग, जन्तु जीवन जाग,
कीड़ी-मकोड़ी जाग, पशु-पक्षी जाग।
नर-नारैण जाग, मरद-औरत जाग,
दिन अर रात जाग, जमीन-आसमान जाग।
शेष समुद्र जाग, खारी समुन्द्र जाग,
दूदी समुद्र जाग, खैराणी समुद्र जाग।
घोर समुद्र जाग, अघोर समुद्र जाग,
प्रचंड समुद्र जाग, श्वेत-बंध रामेसुर जाग।
ह्यूँ हिंवालू[4] जाग पयालू[5] पाणी जाग,
गोवर्धन पर्वत जाग, राधाकुंड जाग।
बाला बैजनाथ जाग, धौली दिप्रियाग जाग,
हरि हरद्वार, काशी विश्वनाथ जाग।
बूढ़ा केदार जाग, भोला शम्भूनाथ जाग,
कालसी कुमौंऊ जाग, चोपड़ा चौथान जाग।
फटिंग का लिंग जाग, सोवन की गादी जाग।

शब्दार्थ
  1. पर्व
  2. आकाश
  3. शिखर
  4. हिमालय
  5. नदी