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प्राण-फूल देश-हित में चढ़ावै छी / बलभद्र नारायण सिंह 'बालेन्दु'

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एक गीत, एक गंध, एक रूप, एक रंग
एक जात, एक पाँत, एक, साँझ, एक प्रात
एक भाव के तरंग पर, गावै छी !
प्राण-फूल दे-हित में चढ़ावै छी !

जनम लेलाँ कहीं, शरण पैलाँ कहीं
एक सें अनेक व्यक्ति केॅ मिलैलाँ कहीं
कहलाँ जीवन-कथा, सुनलाँ दारुण-व्यथा
जलतें देखलाँ शहीदोॅ के अनगिन चिता
क्रान्ति के दूत के हौ चिता-दाह सें-
सृष्टि केॅ साँस देॅ केॅ चलावै छी !

देश के सभ्यता के शिखर नै गिरेॅ
कष्ट सें, क्लेश सें नै यहाँ कोय मरेॅ
उतारेॅ सभैं देश के आरती
राष्ट्र-रथ केॅ जें हाँक बनेॅ सारथी
प्राण सुतलोॅ रहेॅ एक नै देश में-
आग चेतै के हरदम जलावै छी !