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प्रिये! लखौ तुम सर्व-बिलच्छन / हनुमानप्रसाद पोद्दार

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प्रिये! लखौ तुम सर्व-बिलच्छन अपनौ रूप अनूप।
दो‌उ अनादि बिहरत-बिलसत हम, नव पद्धति, नव रूप॥
हम न रमन-रमनी जथार्थ में, न स्वकीय-परकीय।
प्रकृति-पुरुषहू नहीं, निरत नित सुचि क्रीधडा कमनीय॥
निराकार-साकार न हम हैं, निर्बिसेष-सबिसेष।
नहीं सगुन-निरगुन हम दो‌ऊ, नहिं सेषी, नहिं सेष॥
माया-ब्रह्मा, न मायामय हम, नहीं यक्त-‌अयक्त।
प्रेम पूर्णतम, प्रेम-रस-रसिक, रसमय, रस-‌आसक्त॥
नित नव बिकसत मधुर हमारौ रूप अनन्त, अपार।
बढ़त नित्य निष्काम कामना, नित्य नबीन बिहार॥
द्विभुज रूप, लावन्य ललित अति, अतुल, अनिर्बचनीय।
प्रेम-मूर्ति सुचि रूप-सुधा, सौंदर्य नित्य रमनीय॥
प्रेम आत्मा, प्रेम बुद्धि-मन, इंद्रिय पूरन प्रेम।
स्थूल-सूक्ष्म-कारन-बिरहित नित देहहु चिन्मय प्रेम॥
लीला सकल प्रेम-रसरूपा, नित नव प्रेमानंद।
नित्य अबाध, अपरिमित, नव-नव लीला-गति स्वच्छन्द॥
सुर-मुनि समुझि न पा‌ए या कौं, ग‌ए जतन करि हार।
नित्य अचिंत्यानंत, अनिर्बचनीय बिचित्र बिहार॥