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प्रीत तुझको भूलकर जीने लगी पल आज हर / तारकेश्वरी तरु 'सुधि'

प्रीत तुझको भूलकर जीने लगी पल आज हर-
नैन भी इसके नहीं अब जागते हैं रात भर।

खूब रोया आसमां तुमसे जुदा होते समय-
है धरा आँचल तुम्हारा आँसुओं से तर-ब-तर।

कौन-सा रिश्ता बचा है बोल अपने दरमियां-
जो कहूँ ये काश! तुमको देख मैं पाऊँ अगर।

थे किसी का ख़्वाब या तुम थे किसी की आरज़ू-
टूट जाने के निशान मौजूद अब भी आप पर।

एक दिन उसने कहा तुम छोड़ मत जाना मुझे-
हम तभी से बैठे उनकी बेवफाई थाम कर।

पेड़ की इक शाख़ से उसका रहा रिश्ता सदा-
सुन रही हूँ लौट आया एक पंछी आज घर।