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प्रेमक बसात / नीतीश कर्ण

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प्रेमक बुन्नी उमरि- उमरि, आई हमरा पर बरसल
हमर करेज के परती बारी में, प्रेमक गाछ आई उपजल
की जाने औ कौन मौसम छल, की जाने औ कौन नक्षत्र
हमर मनक अन्हार कोठरी में, भेल कोना इज़ोर सर्वत्र
आई धरि नई सोचलउं सपनों में, हमरो पर ई बरखा बरखत
मिलते देरी नैन नैन स’, हमरो पर ई बिजुरि करकत
नैन झुकेने ओ बैसल छल, मिलते नैन की जादू केलक
किछु कहितहुं किछु बाजि नई सकलहुं, की जाने कोन मन्त्र ओ पढ़लक
जानि प्रेमक मौसम छल ओ, किछु हमहुं अंदाज लगेलउं
कोना भिजलउं से बुझि नई सकलउं, तै बरसातक लाथ लगेलउं