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फिर कब आओगी / अनिरुद्ध प्रसाद विमल

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फिर कब आओगी तुम
तुम्हारी याद में
मेरा मन
बैशाख की धूप की तरह
तपने लगा है।
तुम्हारे चले जाने के बाद
मैं शिशिर का पेड़ हो गया हूँ
मेरी आँखें
वसंत को तलासती
अभी भी
गांव की उन गलियों में
भटका करती है
जिन गलियों में तुम मुझे
हमेशा बुलाया करती थी।
मैं आज भी
उन दिनों की तरह ही
गलियों की खाक छानता हूँ
पथ में पड़े पत्थरों को हटाता हूँ
इस प्रतीक्षा में
कि तुम जरुर आओगी

और जब भी आओगी
तुम्हारे पाँवों को चोट न लगे
इतना ही नहीं
अब तो राह में पड़े
उन धूलों में
तुम्हारे पद चिन्हों को
पहचानने का अथक प्रयास करने लगा हूँ
जिस होकर तुम आई थी
जहाँ तुम ठहरी थी

और अब मैंने
तुम्हारे पाँवों के नीचे की धूल को
अपनी मुट्ठियों में
कस कर उठा लिया हैं
और देखने लगा हूँ
आँखें फाड़-फाड़ कर
उसमें श्वेत कमल की पंखुड़ियों सी
तुम्हारे सुकुमार पाँवों की छवि
और मैं चुमने लगा हूँ
लगातार उन धूलों को
आखिर मेरी जिन्दगी में
इसके सिवा
और रही हो क्या गया है ?