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फिर छिड़ी रात बात फूलों की / मख़दूम मोहिउद्दीन

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फिर छिड़ी रात बात फूलों की
रात है या बारात फूलों की ।

फूल के हार, फूल के गजरे
शाम फूलों की रात फूलों की ।

आपका साथ, साथ फूलों का
आपकी बात, बात फूलों की ।

नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं
मिल रही है हयात[1] फूलों की ।

कौन देता है जान फूलों पर
कौन करता है बात फूलों की ।

वो शराफ़त तो दिल के साथ गई
लुट गई कायनात[2] फूलों की ।

अब किसे है दमाग़े तोहमते इश्क़
कौन सुनता है बात फूलों की ।

मेरे दिल में सरूर-ए-सुबह बहार
तेरी आँखों में रात फूलों की ।

फूल खिलते रहेंगे दुनिया में
रोज़ निकलेगी बात फूलों की ।

ये महकती हुई ग़ज़ल 'मख़दूम'
जैसे सहरा में रात फूलों की ।

शब्दार्थ
  1. ज़िन्दगी, जीवन
  2. दुनिया