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फुटकर शेर / त्रिलोकचन्‍द महरूम

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1.
जो तू ग़मख़्वार[1] हो जाये तो ग़म क्या,
ज़माना क्या, ज़माने के सितम क्या ।

2.
ख़लिश[2] ने दिल को मेरे कुछ मज़ा दिया ऐसा,
कि जमा करता हूँ मैं ख़ार[3] आशियाँ के लिए ।

3.
इन बेनियाजियों[4] पै दिल है रहीने-शौक़,[5]
क्या जाने इसको क्या हो जो परवा करे कोई।

4.
दुनिया में न कर किसी से बेइंसाफ़ी,
दुनिया से मगर न रख उम्मीदे-इन्साफ़ ।

शब्दार्थ
  1. हमदर्द, सहानुभूति जताने वाला, दुख-दर्द बाँटने वाला
  2. चुभन, टीस, चिन्ता, फ़िक्र, उलझन
  3. काँटा
  4. उपेक्षा, अनदेखी
  5. अपनी चाहत को गिरवी रखना