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फुदकू जी, फिसल गए / प्रकाश मनु

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फुदकू जी, फुदकू जी, कैसा हाल है,
फुदकू जी, बिगड़ी क्यों इतनी चाल है!
दौड़ रहे थे सरपट-सरपट फुदकू जी,
गिरे फिसलकर हाय, तभी क्या फुदकू जी?
लेकिन ऐसी तेजी भी क्या, फुदकू जी,
होगी अब तो डोली-डंडा, फुदकू जी।

क्या फिर दौड़ोगे तुम कहकर, हर गंगे?
टूटे धागे जोड़ोगे क्या, हर गंगे।
लेकिन तुम तो ऐसे भाई, रोते हो,
बातें करते-करते खुद में खोते हो।
साथ तुम्हारे जाने कितने फिसल गए,
पर वे उठकर आगे सारे निकल गए।
फुदकू जी, फुदकू जी, कैसा हाल है!
फुदकू जी, बिगड़ी क्यों इतनी चाल है?