भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

फूल की पँखुड़ी की बात करो / कांतिमोहन 'सोज़'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

फूल की पँखुड़ी की बात करो ।
आज बस ज़िन्दगी की बात करो ।।

दिल की दिल की लगी की बात करो ।
इश्क़ की बन्दगी की बात करो ।

घिर गया चारसू[1] दरिन्दों से
दोस्त उस आदमी की बात करो ।

हर नज़र मेरी सिम्त उट्ठेगी
शौक़ से तुम किसी की बात करो ।

हम चराग़ां[2] तो कर नहीं सकते
कम से कम रौशनी की बात करो ।

कल नतीजा सुनाया जाएगा
आज रस्साकशी की बात करो ।

है ज़बां फिर भी कुछ नहीं कहती
सोज़ उस ख़ामुशी की बात करो ।।

शब्दार्थ
  1. चारों तरफ़ से
  2. दीपोत्सव