भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

बचपन-2 / मुनव्वर राना

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


मेरा बचपन था मेरा घर था खिलौने थे मेरे
सर पे माँ-बाप का साया भी ग़ज़ल जैसा था
                            **

हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बाँ बच्चे समझते हैं
सगी है या सौतेली है ये माँ बच्चे समझते हैं
                           **


ये बच्ची चाहती और कुछ दिन माँ को ख़ुश रखना
ये कपड़ों के मदद से अपनी लम्बाई छ्पाती है
                           **


ये सोच के माँ -बाप की ख़िदमत[1]में लगा हूँ
इस पेड़ का साया मेरे बच्चों को मिलेगा
                           **

हँसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते

बच्चे भी ग़रीबी को समझने लगे शायद
अब जाग भी जाते हैं तो सहरी [2]नहीं खाते
                       **

शब्दार्थ
  1. सेवा
  2. वह भोजन जो रोज़ा करने सेपहले बहुत तड़के किया जाता है