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बजा के ख़ातिर-ए-अहबाब का ख़याल रहे / राशिद हामिदी

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बजा के ख़ातिर-ए-अहबाब का ख़याल रहे
रक़ाबतों में भी आदाब का ख़याल रहे

बिखरते टूटते आसाब का ख़याल रहे
तिलिस्म-ए-ख़्वाब मेरे ख़्वाब का ख़याल रहे

हर एक ज़ेर ओ ज़बर है बदन का मानी-ख़ेज़
पढ़ों कहीं से भी एराब का ख़याल रहे

हुमकता रहता है पहलू में ना-समझ बच्चा
नफ़स नफ़स दिल-ए-बे-ताब का ख़याल रहे

शब-ए-सियाह की क़िस्मत सँवारने वालो
निगार-ए-काकुल-ए-शब-ताब का ख़याल रहे

बिना सबब तो सफ़-ए-दुश्मनाँ ख़मोश नहीं
हुदूद-ए-जंग में अहबाब का ख़याल रहे

शुऊर शर्त है कार-ए-जुनूँ में ऐ ‘राशिद’
मुसाफ़िरत में भी असबाब का ख़याल रहे