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बढ़ाता है तमन्ना आदमी आहिस्ता-आहिस्ता / हंसराज 'रहबर'

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बढ़ाता है तमन्ना आदमी आहिस्ता आहिस्ता,
गुज़र जाती है सारी ज़िंदगी आहिस्ता आहिस्ता ।

अज़ल से सिलसिला ऐसा है ग़ुंचे फूल बनते हैं,
चटकती है चमन की हर कली आहिस्ता आहिस्ता ।

बहार-ए-ज़िंदगानी परख़ज़ाँ चुपचाप आती है,
हमें महसूस होती है कमी आहिस्ता आहिस्ता ।

सफ़र में बिजलियाँ हैं, आंधियाँ हैं और तूफ़ाँ हैं,
गुज़र जाता है उनसे आदमी आहिस्ता आहिस्ता ।

हो कितनी शिद्दते-ए-ग़म वक़्त आख़िर पोंछ देता है,
हमारे दीदा-ए-तर[1] की नमी आहिस्ता आहिस्ता ।

परेशाँ किसलिए होता है ऐ दिल बात रख अपनी
गुज़र जाती है अच्छी या बुरी आहिस्ता आहिस्ता ।

तबियत में न जाने खाम ऐसी कौन सी शै है,
कि होती है मयस्सर पुख़्तगी आहिस्ता आहिस्ता ।

इरादों में बुलंदी हो तो नाकामी का ग़म अच्छा,
कि पड़ जाती है फीकी हर ख़ुशी आहिस्ता आहिस्ता ।

छुपाएगी हक़ीक़त को नमूद-ए-जाहिरी[2] कब तक,
उभरती है शफ़क[3] से रोशनी आहिस्ता आहिस्ता ।

ये दुनिया ढूँढ़ लेती है निगाहें तेज़ हैं इसकी
तू कर पैदा हुनर में आज़री[4] आहिस्ता आहिस्ता ।

तख़य्युल[5] में बुलन्दी और ज़बाँ में सादगी 'रहबर'
निखर आई है तेरी शायरी आहिस्ता आहिस्ता ।

रचनाकाल : 16 नवम्बर 1941, सेंट्रल जेल, संगरूर

शब्दार्थ
  1. भीगी हुई आँख
  2. ऊपरी दिखावा, बनावट
  3. उषा, लालिमा
  4. आजर इंसान का प्रसिद्ध मूर्तिकार था,यानी कला में पराकाष्ठा
  5. कल्पना