भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बदलती ज़ीस्त के साए बहुत हैं / महेश कटारे सुगम

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बदलती ज़ीस्त के साये बहुत हैं ।
हम अपने आप में उलझे बहुत हैं ।

उठे हैं सर बदलती चाहतों के,
हविस की दौड़ में अन्धे बहुत हैं ।

दिखाई दे रहे मंज़र हसीं जो,
उन्हीं के दरम्याँ धोख़े बहुत हैं ।

लिबासों के नए इस दौर में हम,
पहनकर वस्त्र भी नंगे बहुत हैं ।

दिलों में हैं कहाँ गुंजाइशें अब
यूँ कहने को सुगम रिश्ते बहुत हैं ।