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बना थारो देश देख्यो नी मुलुक देख्यो / निमाड़ी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

बना थारो देश देख्यो नी मुलुक देख्यो,
काई थारा देश की रहेवास
बनड़ाजी धीरा चलो, धीरा धीरा चलो जी सुकुमार,
बनड़ाजी धीरा चलो।।
बनी म्हारो देश माळवो, मुलुक निमाड़,
गाँवड़ा को छे रहेवास।
बनी तुम घर चलो घर चलो जी सुकुमार,
बनी तुम घर चलो।।
बना थारो देश देख्यो, नी मुलुक देख्यो,
काई थारा देश को पणिहार।
बनड़ाजी धीरा चलो, धीरा धीरा चलो जी सुकुमार,
बनड़ाजी धीरा चलो।।
बनी म्हारा घर घर कुवा, न चौक वावड़ी
गाँव मऽ रतन तळाव।
बनी तुम घर चलो जी सुकुमार,
बनी तुम घर चलो।।
बना थारो देश देख्यो, नी मुलुक देख्यो,
काई थारा देश को जीमणार।
बनड़ाजी धीरा चलो, धीरा धीरा चलो जी सुकुमार,
बनड़ाजी धीरा चलो।।
बनी म्हारा ज्वार तुवर का खेत घणा,
घींव दूध की छे भरमार।
बनी तुम घर चलो, घर चलो जी सुकुमार,
बनी तुम घर चलो।।
बनी थारो देश देख्यो नी मुलुक देख्यो,
काई थारा देश को पेरवास।
बनड़ाजी धीरा चलो, धीरा धीरा चलो जी सुकुमार,
बनड़ाजी धीरा चलो।।
बनी म्हारो घर भर रहेट्यो चलावण्यो,
काचळई लुगड़ा को छे पेरवास,
बनी तुम घर चलो, घर चलो जी सुकुमार,
बनी तुम घर चलो।।
बना थारो देश देख्यो नी मुलुक देख्यो,
काई थारा घर को रिवाज।
बनड़ाजी धीरा चलो, धीरा धीरा चलो जी सुकुमार,
बनड़ाजी धीरा चलो।।
बनी म्हारी काकी भाभी छे अति घणी,
माताजी का नरम सुभाव।
बनी तुम घर चलो, घर चलो चलो जी सुकुमार,
बनी तुम घर चलो।।