भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

बन्दर मामा / रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

बन्दर मामा पहन पजामा
जा रहे थे ससुराल |
रस्ते में मिल गये भालूजी
लगने पूछने हाल।

 भरे गले से मामा बोले.
क्या बतलाऊँ भाई।
बँदरिया रानी की एक-
दिन हमसे हुई लड़ाई।

कान दबाकर हम बैठ गए
जब कोने में डर से ।
पहन घाघरा उठा अटैची
वह निकल गई घर से

भालू बोला- मत घबराओ
मैं भी चलूँगा साथ
दोनों जब समझाएँगे, तो
बनेगी बिगड़ी बात ।

बन्दर की ससुराल पहुँच
भालू ने 'नाच दिखाया
ठुमक ठुमककर, घुमक-घुमककर
उनमें मेल कराया
-0-(1-2-1978 -बाजार-पत्रिका)