बन्द प्रेस / एल्विन पैंग / सौरभ राय
(प्रोजेक्ट आयबॉल के लिए, जिसे २८ जून, २००१ को बन्द कर दिया गया था)
पिछले प्रकाशन के पन्नों की चरमराहट के बीच आपने जो सुना
वो हमारी दुनिया की बची-खुची ज़मीन थी
झुँझलाहट थी, साँसें थीं, स्याही थी बस उतनी,
जितनी हमारे कागज़ के नन्हें चिथड़ों को ज़िन्दगी से जूझने,
और फिर उन्हें दम तोड़ता देखने के लिए ज़रूरी थी।
आँखें तड़क-भड़क की ओर मुड़ रहीं थीं, हम बेस्वाद थे
जिस दिन हम मरे, हमने सुना
सायप्रस में गोली चली थी,
और चली गई थी किसी औरत की आँखों की रौशनी,
मातम मनाए जा रहे थे, मग़र हमारे लिए कोई नहीं रोया।
आख़िर, पत्रिकाएँ फिर भी छप रहीं थीं
रंगों को शब्दों में मथती हुई
काग़ज़ फिर भी निकल रहे थे छिटकते हुए
पुल के नीचे बहते पानी की मानिन्द, और वक़्त
फिसलता जा रहा था, इनसानों की तरह
ज़रूरी काम-काज टालते हुए।
आज काग़ज़ों के क़ाबिल नहीं
हमारे ईमान और इरादों की बहस
जो जैसा है, रहने दो, आज
बहने दो इन कागज़ों को एक आख़री बार
बजाय यह सोचने के, कि हम इतनी दूर आ सके।
अँग्रेज़ी से अनुवाद : सौरभ राय