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बयाबानों पे ज़िंदानों पे वीरानों पे क्या गुज़री / सिकंदर अली 'वज्द'

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बयाबानों पे ज़िंदानों पे वीरानों पे क्या गुज़री
जहान-ए-होश में आए तो दीवानों पे क्या गुज़री

दिखाऊँ तुझ को मंज़र क्या गुलों की पाइमाली का
चमन से पूछ ले नौख़ेज़ अरमानों पे क्या गुज़री

बहार आए तो ख़ुद ही लाला ओ नर्गिस बता देंगे
ख़िजाँ के दौर में दिल-कश गुलिस्तानों पे क्या गुज़री

निशान-ए-शम्मा-ए-महफ़िल है न ख़ाक-ए-अहल-ए-महफ़िल है
सहर अब पूछती है रात परवानों पे क्या गुज़री

हमारा ही सफ़ीना तेरे तूफ़ानों का बाइस था
हमारे डूबने के बाद तूफ़ानों पे क्या गुज़री

मैं अक्सर सोचता हूँ ‘वज्द’ उन की मेहरबानी से
ये कुछ गुज़री है अपनों पर तो बे-गानों पे क्या गुज़री