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बरगद ठूँठ हुआ / कुमार रवींद्र

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बरगद अपने आँगन में था
कल वह ठूँठ हुआ

उसकी जड़ को
पता नही कब दीमक चाट गई
अमरबेल लडकों ने रोपी
घर में नई-नई

पुरखों ने पाला-पोसा था
अंधा हुआ सुआ

सगुन-चिरइया का जोड़ा
बरगद पर रहता था
तब यह बरगद
रामराज की गाथा कहता था

इसके साये देते थे
सपनों की हमें दुआ

परिक्रमा करते थे इसकी
सूरज-चाँद सभी
हमें न व्यापी इसके रहते
विपदा कोई कभी

'वटसावित्री' पर किसको
पूजेंगी बड़ी बुआ