Last modified on 30 नवम्बर 2016, at 15:44

बरसा / रूप रूप प्रतिरूप / सुमन सूरो

गरजि-गरजि मेघ करेॅ बरसा!

छिटकि-छिटकि नाँच बिजली छटा,
बिथरि-बिथरि उड़ेॅ, नागिन जटा,
गाछीं-गाछीं जागेॅ प्राण,
झुकी-झुकी नाँच धान,
लरजि-लरजि आबॅे डोली-झकसा!

झुकरि-झुकरि चलेॅ तितलोॅ हवा,
भभरि-भभरि खँस माँटी के लेवा,
मूसा-मूसीं कोड़ेॅ मान,
बेंङा-बेंङीं छोड़ेॅ तान,
डहकि-डहकि गाबेॅ डाहुक-डसा!

छपकि-छपकि उठेॅ पानी में धुआँ,
लपटि-लपटि जरेॅ पोखर-कुआँ
हाहा-हुहु नदी-नार,
नया-नया गिरेॅ लार,
धँसलि धुआँ में धनी धरनि दशा!