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बसंत-1 / प्रदीप प्रभात

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एैलै बसंत
टिसु, रातरानी, केतकी
जुही, चंपा, चमेली
आम केमंजर आरो महुँआ नेॅ
फैलाना शुरू करलकै
आपनोॅ चारों ओर सुगन्ध।
कोयल भी कूह-कूह करेॅ लागलै
सुनाबेॅ लागलै आपनोॅ मधुर तान
फागुनी हवा, चाँदनी रात
एैलै बसंत डोल-डोल
पूनों के चांन गोल-गोल।
मन मोहै छै सब्भैं के
अल्हड़ फागुनी हवा
रस रसाबै छै अंग-अंग।
फागुन के संग, बसंत अनंग।
विहान कोॅ बसंती हवा
सबकेॅ दै छै चैन।