भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बसंत से बातचीत का एक लम्हा / धूमिल

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

 
वक़्त जहाँ पैंतरा बदलता है
बेगाना
नस्लों के
काँपते जनून पर
एक-एक पत्ती जब
जंगल का रुख अख़्तियार करे

आ !
इसीलिए कहता हूँ, आ
एक पैना चाकू उठा
ख़ून कर
क्यों कि यही मौसम है :
काट
कविता का गला काट
लेकिन मत पात
रद्दी के शब्दों से भाषा का पेट
इससे ही
आदमी की सेहत
बिगड़ती है ।

हलका वह होता है,
लेकिन हर हाल में
आदमी को बचना है
गिरी हुई भाषा के खोल में
चेहरा छिपाता है
लेकिन क्या बचता है ?

बचता कत्तई नहीं है।

ऎसे में
ऎसा कर
ढाढ़स दे
पैसा भर

इतना कह
भाई रे !
करम जले मौसम का
नंगापन
नंगई नहीं है।

आ मरदे !
बैठा है पेड़ पर
विधवा के बेटे-सा
फक्कड़-मौलान

नीचे उतर
आदमी के चेहरे को
हँसी के जौहर से
भर दे।
परती पड़े चेहरों पर
कब्ज़ा कर।
हलकू को कर जबर।