भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बसन्त और उल्काएँ / प्रेमचन्द गांधी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तीन बाई दो की उस पथरीली बेंच पर
तुमने बैठते ही पूछा था कि
बसन्त से पहले झड़े हुए पत्‍तों का
उल्काओं से क्या रिश्ता है
पसोपेश में पड़ गया था मैं यह सोचकर कि
उल्काएँ कौनसे बसंत के पहले गिरती हैं कि
पृथ्वी के अलावा सृष्टि में और कहाँ आता है बसन्त
चंद्रमा से पूछा मैंने तो उसने कहा
‘मैं तो ख़ुद रोज़-रोज़ झड़ता हूँ
मेरे यहाँ हर दूसरे पखवाड़े बसन्त आता है
लेकिन उल्काओं के बारे में नहीं जानता मैं’
पृथ्वी ने भी ऐसा ही जवाब दिया
‘मैं तो ख़ुद एक टूटे हुए तारे की कड़ी हूँ
उल्काओं के बारे में तो जानती हूँ मैं
लेकिन बसंत से उनका रिश्ता मुझे पता नहीं’
एक गिरती हुई उल्का ने ही
तुम्हारे सवाल का जवाब दिया
‘ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है और ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र उसकी शाखाएँ हैं
हम जैसे छोटे सितारे उसके पत्‍ते हैं
पृथ्वी पर जब बसन्त आता है तो
हम देखने चले आते हैं
झड़े हुए पत्‍ते हमारे पिछले बरस के दोस्त हैं’

आओ हम दोनों मिलकर
इस बसंत में आयी हुई उल्काओं का स्वागत करें