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बहुत सताई ईखड़े रै तैने / हरियाणवी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

बहुत सताई ईखड़े रै तैने बहुत सताई रे

बालक छाड़े रोमते रै, तैने बहुत सताई रे

डालड़ी मैं छाड्या पीसना

और छाड़ी सलागड़ गाय

नगोड़े ईखड़े, तैने बहुत सताई रे

कातनी मैं छाड्या कातना

और छाड़ेसें बाप और माय

नगोड़े ईखड़े तैने बहुत सताई रे

बहुत सताई ईखड़े रै, तैने बहुत सताई रे

बालक छाड़े रोमते रै, तैने बहुत सताई रे


भावार्थ

--' बहुत सताया है, ईख, तूने मुझे बहुत सताया है । मैं अपने पीछे घर में बच्चों को रोता हुआ छोड़कर आई

हूँ । तूने मुझे बहुत दुखी किया है । डलिया में अनाज पड़ा है और दूध देने वाली गाय को भी मैं बिना दुहे हुए ही

छोड़ आई हूँ । निगोड़ी ईख, तूने मुझे बहुत परेशान किया है । कतनी में पूनियाँ भी बिना काते हुए ही छोड़ आई

हूँ । तेरे लिए मैं अपने माता-पिता को भी बिना देखभाल के ही छोड़ आई हूँ । देख तो ज़रा ईख, तूने मुझे कितना

हैरान किया है । कितना परेशान किया है । पीछे घर में बालकों को रोता छोड़ आई हूँ । तूने बहुत सताया है मुझे ।