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बाई का बाबुलजी नऽ लगायो हय बाग / पँवारी

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पँवारी लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

बाई का बाबुलजी नऽ लगायो हय बाग
मऽरी आम्बा की कोयल उड़ऽ चली।।
बाई तोरा बाबुलजी का बगीचा मऽ काहे को बन्न ओ
बाई तोरा बाबुलजी का बगीचा मऽ केराऽ को बन्न ओ।
बाई तू के राऽ को करजो फरयाउर
मऽरी आम्बा की कोयल उड़ऽ चली।।
बाई तोरा काकाजी का बगीचा मऽ काहे को बन्न ओ
बाई तोरा काकाजी का बगीचा मऽ सन्तरा को बन्न ओ
बाई तू सन्तरा को करजो फरयाउर
मऽरी आम्बा की कोयल उड़ऽ चली।।
बाई का बाबुलजी नऽ लगायो हय बाग
मऽरी आम्बा की कोयल उड़ऽ चली।।