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बाज़ आ गए हैं आज हम उनके ख़याल से / रवि सिन्हा

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बाज़ आ गए हैं आज हम उनके ख़याल से
फ़ुरसत हुई है फ़िक्र-ए-हिज्रो[1] विसाल[2] से

हम भी थे आशना कभी शाहिद[3] थे सब अदीब
अपनी भी क़ुर्बतें[4] रहीं हुस्नो-जमाल[5] से

तशरीह[6] में जवाज़[7] में बेशक ग़ुरूर था
चेहरे पे धूप-छाँव थी रंगे-मलाल से

जो नामिया[8] हयात[9] है तो कीमिया[10] भी हो
कैसे सुकूँ कशीद[11] हो शोरिश[12] वबाल[13] से

जो रात को शिकस्त मिली जुगनुओं के हाथ
तारीकियों[14] को ख़ौफ़ है तिफ़्ले-उजाल[15] से

वो रौंदते हैं ख़ल्क़ो[16]-ज़मीं-आसमाँ-नुजूम[17] 
काँटे निकाल लेते हैं तिरछे हिलाल[18] से

फ़ितने[19] जगाए हैं कहीं शंखो-अज़ान ने
वाबस्तगी[20] अज़ल[21] से है उनको क़िताल[22] से

उम्रे-रवाँ[23] उरूज[24] पे जज़्बों को पंख थे
बे-पर[25] मिलीं बसीरतें[26] दौरे-ज़वाल[27] से

इनकी लिखी किताब पे हरगिज़ न जाइए
तस्वीरे-क़ौम साफ़ है मौजूदा हाल से

शब्दार्थ
  1. वियोग
  2. मिलन
  3. गवाह
  4. निकटता
  5. सौन्दर्य
  6. स्पष्टीकरण
  7. औचित्य
  8. वनस्पति जैसी विकासमानता
  9. जीवन
  10. रसायन-शास्त्र
  11. आसवन, निचोड़ना
  12. उपद्रव
  13. झंझट
  14. अँधेरों
  15. रौशनी के बच्चे
  16. लोग
  17. सितारे
  18. नवचन्द्र
  19. दंगा-फ़साद
  20. सम्बन्ध
  21. आदिकाल
  22. रक्तपात
  23. गतिमान उम्र
  24. चढ़ान
  25. बिना पंख
  26. अन्तर्दृष्टियाँ, बुद्धिमत्ताएँ
  27. अवनति