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बाढ़ऽ के आढऽ मं / सुधीर कुमार 'प्रोग्रामर'

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बाढ़ांे के आढ़ांे मेॅ शतरंगी चाल छै,
कोय कानै जार-जार, कोय मालो-माल छै।
गाय, भैस, बकरी, आदमी, कुत्ता-कुतिया,
हे गे मैया कैसन छौ तोरऽ जीतिया।
चावल गेहूँ, बूट, जो, चिकना की खेसारी,

हड़िया डेकची भसलै, बक्सा पेटारी।
सब्भें यहाँ बोलै-ई बाढ़ नै काल छै,
गरजै बचावऽ, कोय लूटै मेॅ बेहाल छै।
बाढ़ऽ के आढ़ऽ मेॅ शतरंगी...।

कोय बैठी छप्पर पेॅ थर-थर कापै छै,
कोय हेलीकप्टर पेॅ पानी नापै छै।
कत्ते बड़ऽ धोखा दै छै सरकार,
लागै छै किनखौं सं नै छै दरकार।

रेडियो टीवी पर योजना बनावै छै,
आँखऽ सं लोर झूठे ड़ब-ड़ब चूआबै छै।

लूटै के अबसर तॅ बाढ़े सूखाड़ छै,
बेटी विहाबै कं अच्छे जूगाड़ छै।
तार-तार साड़ी, कोय देखै मं बेहाल छै,
बाढ़ऽ के आढ़ऽ मेॅ...।