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बात अब जब भी चलेगी तोप की तलवार की / कांतिमोहन 'सोज़'

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बात अब जब भी चलेगी तोप की तलवार की I
खुद-ब-खुद खुलने लगेगी फ़र्द[1] भ्रष्टाचार की II

कल पुलिस की फायरिंग में सारे आदम बच रहे
लाश एक हिन्दू की निकली दूसरी सरदार की I

जंगे-आज़ादी का चर्चा बंद होना चाहिए
दौरे-देरीना था वो जब क़द्र थी किरदार की I

अब हमारा मुल्क हिस्सा बन चुका है ग्लोब का
ज़िक्र कर हमबिस्तरी का बात मत कर प्यार की I

शान में अपनी क़सीदा सुनके उसने ये कहा
इसको भी शामिल करो तनक़ीद में सरकार की।

अपनी क़िस्मत में बहस में सुर्ख़रू होना न था
जिसकी लाठी बहस उसकी वो तो थी ज़रदार की I

हर इदारा[2] झूठ सिखलाता है हमको रात-दिन
क्या ज़रूरत रह गयी है मुल्क में अखबार की।

सोज़ क्या करना है रहकर ऐसी महफ़िल में जहां
ज़िक्रे-क़ातिल है न कोई बात कू-ए-यार[3] की II


शब्दार्थ
  1. फ़ाइल
  2. संस्था
  3. प्रेमिका की गली