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बाबा नागार्जुन / भरत प्रसाद

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बदलती शताब्दी के,
ठीक-ठीक पहले ही
ढेरों सी जनता की
एक कलम टूट गई।

बंद हुई एक राह
सूख गया एक स्रोत
एक तना उखड़ गया
हम सबसे पहले जो
सत्ता और जनता के
बीच खड़ा रहता था।

पक्की निगाहों से
परख ली राजनीति
देख लिया सता की
शक्तिमान साजिश को,
सधे चोर संसद के
बहुत अच्छे भाषण में
कुर्सी की बदबू थी;
वादे थे बड़े-बड़े
खाली और खतरनाक
हरे-हरे घावों से
भरी हुई जनता पर
मजहब का नमक डाल
जनसेवा करते थे।

कई तरफ़ फैल गए
ऐसे ही चोरों को
जनता के पहरू ने
कविता की लाठी से
रंगे हाथ पकड़ लिया।

ढाँचों का जीवन है--
गाँवों के भारत में
ईश्वर है धनी वर्ग
भूखी जनसंख्या का
औरत को मुक्ति है;
आँचल की सीमा में
खेतिहर की सर्विस में
पैसे का पता नहीं
पढ़े-लिखे भैया का
वाह-वाह क्या कहना।

रिश्वत की रातों में
रंगदार हालचाल
इसी तरह सज्जन से
छिपे हुए कातिल जो
मरी हुई जनता का
कत्लेआम करते थे--
बाबा नागार्जुन ने
खुले-आम खड़ा किया।

वर्तमान उगता था
बाबा की खेती में
साँसों में मिला हुआ
मेहनत का संस्कार
आँखों के आगे के
दलितों को ख़ुशहाली
भीतर की पृथ्वी पर
पीड़ा का सागर था;
एक और एक और
नीचे तक गए हुए
पतले से हाथों में
कालजयी ताकत थी।

बूढ़ी शताब्दी को कंधे पर बैठाकर
दिशाहीन मोड़ों पर
बुद्धि से बचा-बचा
रचना के साहस से
पैदल ही ले जाकर
चौतरफ़ा रातों में
गाँवों की राह पकड़
अगली शताब्दी से
पहले पहुँचाना था।