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बारहमासा / भोजपुरी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

प्रथम मास असाढि सखि हो, गरज गरज के सुनाय।
सामी के अईसन कठिन जियरा, मास असाढ नहि आय॥
सावन रिमझिम बुनवा बरिसे, पियवा भिजेला परदेस।
पिया पिया कहि रटेले कामिनि, जंगल बोलेला मोर॥
भादो रइनी भयावन सखि हो, चारु ओर बरसेला धार।
चकवी त चारु ओर मोर बोले दादुर सबद सुनाई॥
कुवार ए सखि कुँवर बिदेश गईले, तीनि निसान।
सीर सेनुर, नयन काजर, जोबन जी के काल॥
कातिक ए सखी कतकि लगतु है, सब सखि गंगा नहाय।
सब सखी पहिने पाट पीतम्बर, हम धनि लुगरी पुरान॥
अगहन ए सखी गवना करवले, तब सामी गईले परदेस।
जब से गईले सखि चिठियो ना भेजले,तनिको खबरियो ना लेस॥
पुस ए सखि फसे फुसारे गईले, हम धनि बानि अकेली।
सुन मन्दिलबा रतियो ना बीते, कब दोनि होईहे बिहान॥
माघ ए सखि जाडा लगतु है, हरि बिनु जाडो न जाई।
हरि मोरा रहिते त गोद मे सोबइते, असर ना करिते जाड॥
फागुन ए सखि फगुआ मचतु है, सब सखि खेलत फाग।
खेलत होली लोग करेला बोली , दगधत सकल शरीर॥
चैत मास उदास सखि हो एहि मासे हरि मोरे जाई।
हम अभागिनि कालिनि साँपिनि, अवेला समय बिताय॥
बइसाख ए सखि उखम लागे, तन मे से ढुरेला नीर॥
का कहोँ आहि जोगनिया के, हरिजी के राखे ले लोभाई॥
जेठ मास सखि लुक लागे सर सर चलेला समीर।
अबहुँ ना सामी घरवा गवटेला, ओकरा अंखियो ना नीर॥

रइनी - रात , कतिकि - कार्तिक के नहान , फुसारे - पानी बरसेला , फुहार पानी के , सोबइत - सुतावल , दगधत - जरत , लहकत , ढुरेला - गिरेला ( धीरे धीरे ) , गवटेला - लवटेला