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बाल काण्ड / भाग 7 / रामचंद्रिका / केशवदास

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वह हरी हठि हरिनाच्छ दैयत देखि सुंदर देह सों।
वरवीर यज्ञवराह बर ही लयी छीनि सनेह सों।
ह्वै गई बिहविल अंग पृथु फिरि सजे सकल सिंगार जू।
पुनि कछुक दिन वश भयो ताके लियो सरवसु सार जू।।146।।
वह गयो प्रभु परलोक, कीन्हो हिरणाकस्यप नाथ जू।
तेहि भाँति भाँतिन भोगियो भ्रमि प्ल न छोड्यो साथ जू।
वह असुर श्रीनरसिंह मारîो लई प्रबल छँडाइ कै।
लै दई हरि हरिचंद राजहिं बहुत जो सुख पाइ कै।।147।।
हरिचंद विश्वामित्र को दयी दुष्टता जिय जानि कै।
तेहि वरो बलि बरिवंड बरही, विप्र तपसी जानि कै।
बलि बाँधि छल बल लयो बावन, दयी इंद्रहि आनि कै।
तेहि इंद्र तजि पति करîो अर्जुन, सहस भुज को जानि कै।।148।।
तब तासु छबि मद छक्यो अर्जुन हत्थ्यो ऋषि जमदग्नि जू।
परसुराम सो सकुल जारîो प्रबल बल की अग्नि जू।
तेहि बेर तबही सकल छत्रिन मारि मारि बनाइ कै।
इकबीस बेरा दयी विप्रन रुधिर जल अन्हवाइ कै।।149।।
वह रावरे पितु करी पत्नी तजी विप्रन थूँकि कै।
अरु कहत हैं सब रावणादिक रहे ताकहँ ढूँकि कै (उसकी ताक लगाए हैं, उसे लेने की ताक में हैं)।
यहि लाज मरियत, ताहि तुम सों भयो नातो नाथ जू।
अब और मुख निरखैं न ज्यों त्यो राखिîो रघुनाथ जू।।150।।

बारात बिदाई

(सोरठा) प्रात भये सब भूप, बनि बनि मंडप में गये।
जहाँ रूप अनुरूप, ठौर ठौर सब सौभिजैं।।151।।

नाराच छंद

रची विरंचि वास सी निथंबराजिका भली।
जहाँ तहाँ बिछावने बने घने थली थली।
वितान श्वेत श्याम पीत लाल नील के रँगे।
मनो दुहूँ दिसान के समान बिंब से जगे।।152।।

पद्धटिका छंद

गज मोतिन की अवली अपार।
तहँ कलशन पर उरमति सुढार।
सुभ पूरित रति जनु रुचिर धार।
जहँ तहँ अकास गंगा उदार।।153।।
गजदंतन (टोड़ा) की अवली सुदेस।
तहँ कुसुमराजि राजति सुवेस।
सुभ नृप कुमारिका करति गान।
जनु देविन के पुष्पक विमान।।154।।

तामरस छंद

इत उत शोभित सुंदरि डोलैं।
अर्थ अनेकनि बोलनि बोलैं।
सुखमुख मंडल चित्तनि मोहैं।
मनहुँ अनेक करुनानिधि सोहैं।।155।।
भृकुटि विलास प्रकाशित देखे।
धनुष मनोज मनोमय लेखे।
चरचित हास चंद्रिकनि मानो।
सुखमुख वासनि वासित जानो।।156।।
(दोहा) अमल कपोलै आरसी, बाहू चंमक मार।
अवलोकनै विलोकिए, मृगमद (कस्तूरी) मय घनसार।।157।।

पलकाचार

सवैया

बैठे जराय जरे पलिका पर रामसिया सबको मन मोहैं।
ज्योति समूह रहे मढ़िकै, सुर भूलि रहे, बपुरे नर को हैं?
केशव तीनिहुँ लोकन की अवलोकि वृथा उपमा कवि टोहैं।
शोभन सूरजमण्डल माँझ मनौ कमला-कमलापति सोहैं।।158।।

राम का शिखनख

(दोहा) गंगाज5ल (एक प्रकार का कपड़ा) की पाग सिर, सोहत श्रीरघुनाथ।
शिव सिर गंगाजल किधौं, चंद्र चंद्रिका साथ।।159।।

तोमर छंद

कछु भृकुटि कुटिल सुवेश। अति अमल सुमिल सुदेश।
विधि लिखयो सोधि सुतंत्र। जनु जया जय के मंत्र।।160।।
(दोहा) यदपि भृकुटि रघुनाथ की, कुटिल देखियत ज्योति।
तदपि सुरासुर नरन की, निरखि शुद्ध गति होति।।161।।
श्रवन मकर कुंडल लसत, मुख सुखमा एकत्र।
ससि समीप सोहत मनो, श्रवन मकर नक्षत्र।।162।।

पद्धटिका छंद

अति वदन सोभ सरसी (तालाब) सुरंग।
तह कमल नयन नासा तरंग।
जनु युवति चित्त विभ्रम विलास।
तेइ भ्रमर भँवत रस रूप आस।।163।।

निशिपालिका छंद

सोभिजति दंतरुचि (दाँतों की कांति) सुभ्र उर आनिए।
सत्य जनु रूप अनुरूपक बखानिए।
ओंठ रुचि रेख सविसेख सुभ श्रीरये।
सोधि जनु ईस शुभ लक्षण सबै दयै।।164।।
(दोहा) ग्रीवा श्रीरघुनाथ की, लसति कंबुवर वेख।
साधु मनो बच काय की, मानो लिखी त्रिरेख।।165।।

सुदरी छंद

सोभन दीरघ बाहु विराजत।
देव सिहात, अदेव ते लाजत।
वैरिन को अहिराज बखानहु।
हे हितकारिन की ध्वज मानहु।।166।।
ज्यौ उर मैं भृगु-लात बखानहु।
श्री कर को सरसीरुह मानहु।
सोहति है उर में मनि यों जनु।
जानकि को अनुरागि रह्यो मनु।।167।।

(दोहा) सोहत जनरत-रामउर, देखत जिनको भाग।
आइ गयो ऊपर मनो अंतर को अनुराग।।168।।

पद्धटिका छंद

सुभ मोतिन की दुलरी सुदेस।
जनु वेदन के अच्छर सुबेस।
गजमोतिन की माला बिसाल।
मन मानहुँ संतन के मराल।।169।।