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बीती विभावरी जाग री / जयशंकर प्रसाद

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बीती विभावरी जाग री!

अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा नागरी!

खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा
किसलय का अंचल डोल रहा
लो यह लतिका भी भर ला‌ई-
मधु मुकुल नवल रस गागरी

अधरों में राग अमंद पिए
अलकों में मलयज बंद किए
तू अब तक सो‌ई है आली
आँखों में भरे विहाग री!

और लीजिए अब इस कविता का अँग्रेज़ी अनुवाद पढ़िए
      JAISHANKAR PRASAD
                  AUBADE

Awake for the night is spent.
In the well of the sky the dawn
Dips her vessel of stars
To the sound of birds at their morning-song,
The young leaves
Are a veil, swaying.
How soft along the vine are the buds of Spring.
Awake for the night is spent.
Your lips hold life in a stillness;
Your hair entraps the south-wind.
Ah, you are asleep with the night-song full in in your eyes.
Awake. The night is spent.
——
(Translated from the Hindi by Romila Thapar)