भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
  काव्य मोती
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बुझो बूझो गोरखनाथ अमरित बानी / छत्तीसगढ़ी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

बुझो बूझो गोरखनाथ अमरित बानी

बरसे कमरा भींजे ल पानी जी

कौआ के डेरा मा पीपर के बासा

मुसवा के बिला म बिलई होय नासाजी

बूझो बूझो.....

तरी रे घैला उप्पर पनिहारी

लइका के कोरा म खेले महतारी जी

बुझो-बुझो

भागे ले कुकुर भूँके ले चोर

मरगे मनखे झींकत हे डोर जी

बुझो-बुझो


बांधे ले घोड़ा, भागे ले खूंटा

चढ़ के नगाड़ा बजावत हे ऊंटा जी

बुझो-बुझो

पहली हे पूछें पीछे भय माई

चेला के गुरू लागत हे पाईं जी

बुझो-बुझो