भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बुझौवल- खण्ड-3 / अमरेन्द्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

21
देखोॅ जबेॅ किताबे पर छै
कपड़ो के ओत्है शौकीन
तहियो एक नै अक्षर जानै
नाँगटै घूमै भारत-चीन ।
-मूसोॅ
22
पीढ़ा पर बैठली इक बुढ़िया
घुमी-घुमी गावी केॅ खाय
नाक बाटेॅ सें जे कुछ निगलै
मुँह दै केॅ सब उगली जाय ।
-चक्की
23
एक राकस के मुँह अजूबा
आँखे सीधी में मुँह-नाक
गल्ला बाटें खैलोॅ उगलै
निगलै वक्ती पारै हाँक ।
-चक्की
24
दू नालोॅ के इक बन्दूक
बन्दूक लागै छै सन्दूक
एक साथ गोलियै नै चार
छोड़वैय्या के गोड़ो पार
-पैजामा
25
पानी पर एक राकस दौड़ै
मुँह में लैकेॅ लोग पचीस
मुँह में जाय लेॅ मार करै सब
मुँह में लै केॅ माँगै फीस ।
-नाव
26
उड़तें कोॅन चिड़ैयाँ के ई
कटी गेलोॅ छै डैनोॅ-पाँख
लोर-चुआवै ढर-ढर, ढर-ढर
फोटो लेलेॅ घूमै आँख ।
-नाव
27
के जानै छैं ऊ नावोॅ केॅ
जे कि पानी में नै तैरै
पानी ही जेकरा में तैरै
खेवै, गोरी गुन भावोॅ केॅ ।
-दीया
28
हेनोॅ इक सूरज छै मस्त
रात्है रोशन, दिन में अस्त ।
-दीया
29
आँख-कान नै, खाली जी छै
जी सें जेकरा चाहै चाटै
कुआँ-पोखरी डरैं नै जाय छै
मोॅन-नहैवोॅ सुनिये फाटै ।
-आग
30
अजब कहानी इक नारी के
आँख क्रोध सें रत-रत लाल
चूल तेॅ एकदम हिन्दुस्तानी
ईंगलिस्तानी गोरोॅ गाल ।
-आगिन