भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बुझौवल- खण्ड-6 / अमरेन्द्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


51
घड़ियाले रँ चोखोॅ दाँत
पानी पर जे बुलै नै जाय
जंगल-जंगल खाली घूमै
जीव के बदला गाछे खाय ।
-आरी
52
तीर-धनुष सें कसलोॅ-बन्हलोॅ
फहरै केन्होॅ खड़ा रूमाल
ऊपर-नीचें पिछुआवै छै
जात्है केॅ, जाते रोॅ काल ।
-गुड्डी
53
एक चिड़ैयाँ हेनोॅ कोॅन
जेकरोॅ माँस नै खैलोॅ जाय
जेकरोॅ खोता मिलै कहीं नै
गाछ नै बैठै, उड़ै उघाय ।
-गुड्डी
54
भगजोगनी सें भौरा जन्मै
कोय भले नै ई पतियावै
पंख जेन्है भौरा सें निकलै
उड़ी-मुड़ी आँखें पर आवै ।
-काजल
55
सोनोॅ के देह, मूड़ी कारोॅ
मौगी-मरद सभै केॅ प्यारोॅ
हौल्कोॅ जेना हवै रँ ऊ
लीपै केरोॅ मनाही छै
माय कहै ई विपदाहारी
बच्चा लेॅ ई आफत भारी ।
-काजल
56
अंगुरी में अंगुठी रँ बैठै
आरी केरोॅ सहेली
अमरेन्दर भी नै बूझै छै
हेनोॅ छिकै पहेली ।
-कैंची
57
पीछू कटै तेॅ कौआ बोलै
आगू कटै तेॅ बगरो
बैठै तेॅ हाथे पर बैठै
मिलै घरे घर सगरो ।
-कैंची
58
हेनोॅ पेट मुटैलोॅ छै कि
गोड़ दिखै नै हाथ दिखै
खाय लेॅ वैद्य मना करले ॅ छै
मुँह बैलेॅ दिन-रात दिखै
हेनोॅ आबेॅ जिनगी जीयै
पेट भरी बस पानी पीयै ।
-घैलोॅ
59
पीछू कटै तेॅ दारू पीयै
आगू कटै बटोही
तीन वर्ण के नर केॅ मोहै
चिड़ियाँ लेॅ निरमोही ।
-सुराही
60
बान्हलोॅ राखै रातो पगड़ी
गल्ला में टाई केॅ जकड़ी
भरी रात तक सुतले रहतौं
बन्द करी केॅ आपनोॅ द्वार
भारे उठी केॅ पहरा देथौं
हेनोॅ तेॅ ऊ पहरेदार ।
-मुर्गा