भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

बुझौवल- खण्ड-9 / अमरेन्द्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

81
सब गामोॅ के, सब देशोॅ के
हाल सुनावै आवै चिड़ियाँ
डैना-लाल, हरा, पीला छै
कोॅन राग नै गावै चिड़ियाँ
दिन भर खुब्बे शोर मचाय
दिन आवै, साँझै मरी जाय ।
-अखबार
82
बिना डोलैलें जरो नै डोलै
दुनिया भर के बोली बोलै
कान मोचारोॅ तेॅ ठिठियैतौं
कानतौं, बोलतौं, गाना गैतौं ।
-रेडियो
83
दूधे रं उजरोॅ देह
कारोॅ मन कौआ
गर्दन रं टाँग दिखै
पेटे अबढौआ ।
-बगुला
84
चारे अक्षर गजब करै
पीछू तीन कटै तेॅ मू छै
आगू दू कटथैं सुख-चैन
आगू एक कटै तेॅ सब छै
पीछू दू कटै तेॅ मूसोॅ
वैं की बुझतै जे खाय भूसोॅ ।
-मुसकल
85
गल्ला में कंठी छै
कंठोॅ में राम
साधू रँ चोला छै
तहियो बदनाम ।
-सुग्गा
86
उजरोॅ रहै तेॅ सब्भे केरोॅ
उजरोॅ दाँत अमैठै
लाल हुऐ तेॅ लाल ठोर पर
सबके जाय केॅ बैठै ।
-आम
87
उजरोॅ रहै तेॅ कचकच-खपखप
नै कस्सोॅ नै खट्टा ऊ
लाल हुऐ तेॅ आम बनै छै
मोती खाय केॅ पट्ठा ऊ ।
-पपीता
88
चमड़ी भीतर कसलोॅ माँस
माँसोॅ पीछू हड्डी
हड्डी बादे फेनू माँसे
ओकरोॅ बाद फिसड्डी ।
-आम
89
हरमोनियम के आपनोॅ भाय
पर गावै में घोर लजाय
दाँत छियालिस चैव्वौ दस
अक्षर सबटा घोघलोॅ-बस ।
-टाईपराइटर
90
खुद्दे आन्हरोॅ आँख कहावै
दुसरा केॅ दुनिया दिखलावै
वै सें बड़ोॅ नै कोय शैतान
नाको पकड़ै, पकड़ै कान ।
-चश्मा